शान्ति पर्व  अध्याय ३४७

नागभार्यो उवाच

विप्रक्षत्रिय़वैश्यानां शुश्रूषा शूद्रकर्म तत् |  ७   क
गृहस्थधर्मो नागेन्द्र सर्वभूतहितैषिता ||  ७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति