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शान्ति पर्व
अध्याय ३४९
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व्राह्मण उवाच
अहमात्मानमात्मस्थो मार्गमाणोऽऽत्मनो हितम् |  १४   क
वासार्थिनं महाप्राज्ञ वलवन्तमुपास्मि ह ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति