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शान्ति पर्व
अध्याय ३४९
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व्राह्मण उवाच
धर्मारण्यं हि मां विद्धि नागं द्रष्टुमिहागतम् |  ५   क
पद्मनाभं द्विजश्रेष्ठं तत्र मे कार्यमाहितम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति