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शल्य पर्व
अध्याय ३४
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जनमेजय़ उवाच
सारस्वतानां तीर्थानां गुणोत्पत्तिं वदस्व मे |  ३३   क
फलं च द्विपदां श्रेष्ठ कर्मनिर्वृत्तिमेव च ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति