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शल्य पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
ऊर्ध्ववेणीधरा चैव पिङ्गाक्षी लोहमेखला |  १८   क
पृथुवक्त्रा मधुरिका मधुकुम्भा तथैव च ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति