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सभा पर्व
अध्याय ३८
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शिशुपाल उवाच
न त्वहं तव धर्मज्ञ पश्याम्युपचय़ं क्वचित् |  २५   क
न हि ते सेविता वृद्धा य एवं धर्ममव्रुवन् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति