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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३५
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वैशम्पाय़न उवाच
निय़ोगाद्व्रह्मणः पूर्वं मय़ा स्वेन वलेन च |  १५   क
वैचित्रवीर्यके क्षेत्रे जातः स सुमहामतिः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति