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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३५
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वैशम्पाय़न उवाच
त्वां चापि श्रेय़सा योक्ष्ये नचिराद्भरतर्षभ |  २३   क
संशय़च्छेदनार्थं हि प्राप्तं मां विद्धि पुत्रक ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति