आश्रमवासिक पर्व  अध्याय ३५

वैशम्पाय़न उवाच

कच्चिन्नन्दसि दृष्ट्वैतान्कच्चित्ते निर्मलं मनः |  ८   क
कच्चिद्विशुद्धभावोऽसि जातज्ञानो नराधिप ||  ८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति