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सभा पर्व
अध्याय ३५
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वैशम्पाय़न उवाच
नेदं युक्तं महीपाल यादृशं वै त्वमुक्तवान् |  २   क
अधर्मश्च परो राजन्पारुष्यं च निरर्थकम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति