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सभा पर्व
अध्याय ३५
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वैशम्पाय़न उवाच
पश्य चेमान्महीपालांस्त्वत्तो वृद्धतमान्वहून् |  ४   क
मृष्यन्ते चार्हणां कृष्णे तद्वत्त्वं क्षन्तुमर्हसि ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति