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वन पर्व
अध्याय ३५
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युधिष्ठिर उवाच
श्रिय़ं च लोके लभते समग्रां; मन्ये चास्मै शत्रवः संनमन्ते |  २०   क
मित्राणि चैनमतिरागाद्भजन्ते; देवा इवेन्द्रमनुजीवन्ति चैनम् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति