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वन पर्व
अध्याय ३५
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युधिष्ठिर उवाच
अक्षान्हि दृष्ट्वा शकुनेर्यथाव; त्कामानुलोमानय़ुजो युजश्च |  ४   क
शक्यं निय़न्तुमभविष्यदात्मा; मन्युस्तु हन्ति पुरुषस्य धैर्यम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति