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विराट पर्व
अध्याय ३५
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वैशम्पाय़न उवाच
पृथिवीमजय़त्कृत्स्नां कुन्तीपुत्रो धनञ्जय़ः |  ११   क
सैरन्ध्री त्वां समाचष्ट सा हि जानाति पाण्डवान् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति