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सभा पर्व
अध्याय ३७
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वैशम्पाय़न उवाच
विप्लुता चास्य भद्रं ते वुद्धिर्वुद्धिमतां वर |  १२   क
चेदिराजस्य कौन्तेय़ सर्वेषां च महीक्षिताम् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति