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उद्योग पर्व
अध्याय ३५
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विदुर उवाच
पापं प्रज्ञां नाशय़ति क्रिय़माणं पुनः पुनः |  ५२   क
नष्टप्रज्ञः पापमेव नित्यमारभते नरः ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति