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शल्य पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
मध्यमः पाण्डवस्तीक्ष्णो भीमसेनो महावलः |  १३   क
प्रतिज्ञातं च तेनोग्रं स भज्येत न संनमेत् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति