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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
स वाहुभ्यां सागरमुत्तितीर्षे; न्महोदधिं सलिलस्याप्रमेय़म् |  ६५   क
तेजस्विनं कृष्णमत्यन्तशूरं; युद्धेन यो वासुदेवं जिगीषेत् ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति