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सौप्तिक पर्व
अध्याय २
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कृप उवाच
ते पृष्टाश्च वदेय़ुर्यच्छ्रेय़ो नः समनन्तरम् |  ३२   क
तदस्माभिः पुनः कार्यमिति मे नैष्ठिकी मतिः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति