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द्रोण पर्व
अध्याय ७४
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सञ्जय़ उवाच
तं दृष्ट्वा कुरवस्त्रस्ताः प्रहृष्टाश्चाभवन्पुनः |  ३३   क
अभ्यवर्षंस्तदा पार्थं समन्ताद्भरतर्षभ ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति