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द्रोण पर्व
अध्याय ३५
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सञ्जय़ उवाच
हतान्पुत्रांस्तथा पितॄन्सुहृत्सम्वन्धिवान्धवान् |  ४४   क
प्रातिष्ठन्त समुत्सृज्य त्वरय़न्तो हय़द्विपान् ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति