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शल्य पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
वभूव श्रीमती राजञ्शाण्डिल्यस्य महात्मनः |  ७   क
सुता धृतव्रता साध्वी निय़ता व्रह्मचारिणी ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति