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शल्य पर्व
अध्याय ३५
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वैशम्पाय़न उवाच
कदाचिद्धि ततो राजन्भ्रातरावेकतद्वितौ |  १४   क
यज्ञार्थं चक्रतुश्चित्तं धनार्थं च विशेषतः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति