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द्रोण पर्व
अध्याय ६७
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सञ्जय़ उवाच
भल्लाभ्यां भृशतीक्ष्णाभ्यां तं च विव्याध पाण्डवः |  ६३   क
स तु पार्थं त्रिभिर्विद्ध्वा सिंहनादमथानदत् ||  ६३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति