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वन पर्व
अध्याय ७१
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वृहदश्व उवाच
ऋतुपर्णोऽपि राजा स धीमान्सत्यपराक्रमः |  २२   क
राजानं राजपुत्रं वा न स्म पश्यति कञ्चन |  २२   ख
नैव स्वय़ंवरकथां न च विप्रसमागमम् ||  २२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति