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शल्य पर्व
अध्याय ३५
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वैशम्पाय़न उवाच
तं ज्ञात्वा पतितं कूपे भ्रातरावेकतद्वितौ |  २७   क
वृकत्रासाच्च लोभाच्च समुत्सृज्य प्रजग्मतुः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति