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शल्य पर्व
अध्याय ३५
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वैशम्पाय़न उवाच
स चाविशद्दिवं राजन्स्वरः शैक्षस्त्रितस्य वै |  ३५   क
समवाप च तं यज्ञं यथोक्तं व्रह्मवादिभिः ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति