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शल्य पर्व
अध्याय ३५
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वैशम्पाय़न उवाच
त्रितस्य वर्तते यज्ञस्तत्र गच्छामहे सुराः |  ३८   क
स हि क्रुद्धः सृजेदन्यान्देवानपि महातपाः ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति