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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
सहस्रं तस्य सिंहानां तस्मिन्युक्तं रथोत्तमे |  २   क
उत्पपात दिवं शुभ्रं कालेनाभिप्रचोदितः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति