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शल्य पर्व
अध्याय ३५
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो यथाविधि प्राप्तान्भागान्प्राप्य दिवौकसः |  ४४   क
प्रीतात्मानो ददुस्तस्मै वरान्यान्मनसेच्छति ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति