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शल्य पर्व
अध्याय ३५
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वैशम्पाय़न उवाच
क्रुद्धः स तु समासाद्य तावृषी भ्रातरौ तदा |  ४८   क
उवाच परुषं वाक्यं शशाप च महातपाः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति