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शान्ति पर्व
अध्याय ३५०
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नाग उवाच
स लोकांस्तेजसा सर्वान्स्वभासा निर्विभासय़न् |  १०   क
आदित्याभिमुखोऽभ्येति गगनं पाटय़न्निव ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति