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शान्ति पर्व
अध्याय ३५१
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सूर्य उवाच
असन्नधीरनाकाङ्क्षी नित्यमुञ्छशिलाशनः |  ४   क
सर्वभूतहिते युक्त एष विप्रो भुजङ्गम ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति