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विराट पर्व
अध्याय ६१
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वैशम्पाय़न उवाच
शान्तिं पराश्वस्य यथा स्थितोऽभू; रुत्सृज्य वाणांश्च धनुश्च चित्रम् |  २१   क
न त्वेव वीभत्सुरलं नृशंसं; कर्तुं न पापेऽस्य मनो निविष्टम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति