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द्रोण पर्व
अध्याय ५७
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सञ्जय़ उवाच
यदि तद्विदितं तेऽद्य श्वो हन्तासि जय़द्रथम् |  १७   क
अथ ज्ञातुं प्रपद्यस्व मनसा वृषभध्वजम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति