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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३६
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जनमेजय़ उवाच
विदुरे चापि संसिद्धे धर्मराजं व्यपाश्रिते |  २   क
वसत्सु पाण्डुपुत्रेषु सर्वेष्वाश्रममण्डले ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति