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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३६
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वैशम्पाय़न उवाच
दर्शनादेव भवतां पूतोऽहं नात्र संशय़ः |  २५   क
विद्यते न भय़ं चापि परलोकान्ममानघाः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति