वन पर्व  अध्याय २२२

वैशम्पाय़न उवाच

अभिपन्नास्मि पाञ्चालि याज्ञसेनि क्षमस्व मे |  ५९   क
कामकारः सखीनां हि सोपहासं प्रभाषितुम् ||  ५९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति