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भीष्म पर्व
अध्याय ८६
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सञ्जय़ उवाच
स निकृत्तं धनुर्दृष्ट्वा खं जवेन समाविशत् |  ५७   क
इरावन्तमभिक्रुद्धं मोहय़न्निव माय़या ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति