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वन पर्व
अध्याय २८१
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यम उवाच
उदाहृतं ते वचनं यदङ्गने; शुभे न तादृक्त्वदृते मय़ा श्रुतम् |  ४३   क
अनेन तुष्टोऽस्मि विनास्य जीवितं; वरं चतुर्थं वरय़स्व गच्छ च ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति