विराट पर्व  अध्याय ३६

वैशम्पाय़न उवाच

समवेतान्कुरून्यावज्जिगीषूनवजित्य वै |  २   क
गाश्चैषां क्षिप्रमादाय़ पुनराय़ामि स्वं पुरम् ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति