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विराट पर्व
अध्याय ३६
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वैशम्पाय़न उवाच
उत्तरं तु प्रधावन्तमनुद्रुत्य धनञ्जय़ः |  ३७   क
गत्वा पदशतं तूर्णं केशपक्षे परामृशत् ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति