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विराट पर्व
अध्याय ३६
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वैशम्पाय़न उवाच
सोऽर्जुनेन परामृष्टः पर्यदेवय़दार्तवत् |  ३८   क
वहुलं कृपणं चैव विराटस्य सुतस्तदा ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति