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विराट पर्व
अध्याय ३६
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वैशम्पाय़न उवाच
मा भैस्त्वं राजपुत्राग्र्य क्षत्रिय़ोऽसि परन्तप |  ४४   क
अहं वै कुरुभिर्योत्स्याम्यवजेष्यामि ते पशून् ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति