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उद्योग पर्व
अध्याय ३६
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हंस उवाच
यदि सन्तं सेवते यद्यसन्तं; तपस्विनं यदि वा स्तेनमेव |  १०   क
वासो यथा रङ्गवशं प्रय़ाति; तथा स तेषां वशमभ्युपैति ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति