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उद्योग पर्व
अध्याय ३६
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हंस उवाच
प्राप्नोति वै वित्तमसद्वलेन; नित्योत्थानात्प्रज्ञय़ा पौरुषेण |  २१   क
न त्वेव सम्यग्लभते प्रशंसां; न वृत्तमाप्नोति महाकुलानाम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति