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उद्योग पर्व
अध्याय ३६
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विदुर उवाच
चलानि हीमानि षडिन्द्रिय़ाणि; तेषां यद्यद्वर्तते यत्र यत्र |  ४६   क
ततस्ततः स्रवते वुद्धिरस्य; छिद्रोदकुम्भादिव नित्यमम्भः ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति