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द्रोण पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
प्रादात्काञ्चनमेकैकं निष्कं विप्राय़ पाण्डवः |  १७   क
अलङ्कृतं चाश्वशतं वासांसीष्टाश्च दक्षिणाः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति