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उद्योग पर्व
अध्याय ३६
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विदुर उवाच
न वै भिन्ना जातु चरन्ति धर्मं; न वै सुखं प्राप्नुवन्तीह भिन्नाः |  ५४   क
न वै भिन्ना गौरवं मानय़न्ति; न वै भिन्नाः प्रशमं रोचय़न्ति ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति