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शल्य पर्व
अध्याय ४१
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वैशम्पाय़न उवाच
त्वमेवाकाशगा देवि मेघेषूत्सृजसे पय़ः |  ३०   क
सर्वाश्चापस्त्वमेवेति त्वत्तो वय़मधीमहे ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति