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कर्ण पर्व
अध्याय ३६
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सञ्जय़ उवाच
निपतन्ति तथा भूमौ स्फुरन्ति च सहस्रशः |  २५   क
वेगांश्चान्ये रणे चक्रुः स्फुरन्त इव पन्नगाः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति